सेहत : गोल्डेन एज को दवाइयों के सहारे न बितायें

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 14 जुलाई 2024 | जयपुर : उम्र के दो पड़ाव बचपन और बुढ़ापा बीमारियों का घर होते हैं। जरा सी असावधानी हुई कि बीमारी आ धमकी। असल में बच्चों की इम्यूनिटी पूरी तरह विकसित नहीं हुई होती है। जबकि वयस्क उम्र बीत जाने के बाद हमारी इम्यूनिटी कमजोर होने लगती है।

सेहत : गोल्डेन एज को दवाइयों के सहारे न बितायें

गोल्डेन एज को दवाइयों के सहारे न बितायें

बचपन में तो वैक्सीनेशन हमें ज्यादातर बीमारियों से बचा लेता है, लेकिन बुढ़ापे में कई बीमारियां घेर लेती हैं और दवाइयों का सहारा लेना पड़ता है। दवाइयों पर इस निर्भरता को मेडिसिन डिपेंडेंसी या ड्रग डिपेंडेंसी कहते हैं।

इस कंडीशन को ऐसे समझिए कि जब हमारा शरीर अपना बुनियादी कामकाज करने में सक्षम नहीं रहता, शरीर के ऑर्गन्स को बेसिक फंक्शनिंग के लिए दवाओं की जरूरत पड़ने लगती है तो इसे मेडिसिन डिपेंडेंसी कहते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, यह हमारे स्वास्थ्य के लिए एक खतरनाक स्थिति है।

आज ‘सेहतनामा’ में बात करेंगे मेडिसिन डिपेंडेंसी की। साथ ही जानेंगे कि-

  • हमारा शरीर कब मेडिसिन डिपेंडेंट हो जाता है?
  • मेडिसिन डिपेंडेंसी के क्या लक्षण हैं?
  • इससे उबरने के क्या उपाय हैं?

गोल्डेन एज को दवाइयों के सहारे न बिताएं

कोई शख्स बचपन से लेकर वयस्क होने तक जी-तोड़ मेहनत करता है। अच्छी नौकरी हासिल करता है, फिर मकान, गाड़ी और घर की तमाम सुख-सुविधाएं जुटाता है। इसके बाद शादी-ब्याह, बच्चे, फिर उनकी पढ़ाई-लिखाई। यही करते-करते उम्र बीत जाती है और रिटायरमेंट नजदीक आ जाता है।

इस उम्र तक अकसर लोग अपनी ज्यादातर जिम्मेदारियों से मुक्त हो चुके होते हैं और अब यह बेफिक्र होकर जीने का समय होता है। लेकिन इसी समय तमाम बीमारियां घेर लेती हैं और जिंदगी दवाइयों पर निर्भर हो जाती है।

50 की उम्र तक घेर लेती हैं कई बीमारियां

एसएमएस के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. गोपाल मीणा कहते हैं कि 50 से अधिक उम्र के जो ज्यादातर पेशेंट आते हैं, वे कई तरह की लाइफस्टाइल डिजीज से ग्रसित होते हैं। लाइफस्टाइल बीमारियों के साथ सबसे बड़ी समस्या ये है कि एक बार इन्होंने घेर लिया तो दवाइयां स्किप करना काल बन सकता है। रोज नियमित रूप से दवाइयां खानी ही पड़ती हैं।

दवाओं का सेवन करते-करते हो जाता है एडिक्शन

  • जब हम कुछ दवाएं रोज खा रहे होते हैं तो हमें उनकी लत लग जाती है। इनके बगैर सबकुछ मुश्किल लगने लगता है। हमारा शरीर इन दवाइयों पर इस कदर निर्भर हो जाता है कि इनके बिना शरीर का बुनियादी कामकाज तक मुश्किल हो जाता है।
  • अगर इन दवाइयों का सेवन बंद कर दिया जाए तो कई हेल्थ इश्यूज का जोखिम हो सकता है।

मेडिसिन डिपेंडेंसी से बचने का रास्ता क्या है?

अगर वृद्धावस्था बीमारियों और दवाइयों के बगैर गुजरे तो इससे बड़ा और कोई सुख नहीं है। उम्र के इस पड़ाव तक आते-आते ज्यादातर चिंताएं खत्म हो चुकी होती हैं, सारी जिम्मेदारियों से निवृत्ति मिल चुकी होती है। ऐसे में किसी समस्या के बिना आसानी से जिंदगी गुजारी जा सकती है। डॉ. अमित समाधिया ने इसके लिए 6 तरीके बताए हैं, जिन्हें अपनाकर मेडिसिन डिपेंडेंसी से बचा जा सकता है।

वैक्सीनेशन है जरूरी

ज्यादातर लोग जानते हैं कि शिशुओं और बच्चों को वैक्सीन लगवाकर उन्हें बीमारियों से बचाया जा सकता है। इसे लेकर खूब अवेयरनेस है और लोग अपने बच्चों को वैक्सीन लगवाते भी हैं। हमें समझने की जरूरत है कि वैक्सीनेशन सिर्फ बच्चों के लिए नहीं होता है। कई वैक्सीन्स हमें किसी भी उम्र में बीमारियों से बचा सकती हैं, ये बुजुर्गों के लिए और भी काम की हो सकती हैं।

असल में जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, इम्यून सिस्टम कमजोर होता जाता है, जिससे न्यूमोकोकल डिजीज, इन्फ्लूएंजा और दाद जैसे संक्रमणों का खतरा बढ़ जाता है। बुढ़ापे में ये संक्रमण और गंभीर हो सकते हैं क्योंकि शरीर जल्दी रिकवर नहीं हो पाता है।

दाद का संक्रमण कई महीनों तक परेशान कर सकता है और निमोनिया हुआ तो अस्पताल में भी भर्ती होना पड़ सकता है। जबकि वैक्सीनेशन इन संक्रमणों के शारीरिक, मानसिक और आर्थिक बोझ से हमें बचा सकता है।

डॉक्टर से मिलकर दाद, निमोनिया, इन्फ्लूएंजा, डिप्थीरिया और काली खांसी के वैक्सीनेशन के बारे में पूछ सकते हैं। ये वैक्सीन बुजुर्ग अवस्था की कई बीमारियों और मेडिसिन डिपेंडेंसी से बचा सकती हैं।

एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर डाइट लें

रंग-बिरंगे फल और सब्जियां, मछली, सीड्स और नट्स एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होते हैं। ये डाइट स्किन डैमेज, कॉग्निटिव और मेमोरी में गिरावट जैसे एजिंग के लक्षणों को रोकने में भी मददगार हो सकती है। एंटीऑक्सीडेंट्स की पूर्ति के लिए जामुन, स्ट्रॉबेरी, बीन्स, हल्दी, लहसुन, नट्स आदि का सेवन करते रहें।

प्रोटीन, कैल्शियम और विटामिन D से भरपूर डाइट लें

ढलती उम्र में बोन्स और मसल्स कमजोर पड़ने लगते हैं। ऐसे में हड्डियों और मांसपेशियों की मजबूती बनाए रखने के लिए प्रोटीन, कैल्शियम और विटामिन D का संतुलित सेवन बेहद आवश्यक होता है। इसके लिए डॉक्टर से बात कर सकते हैं कि इनके संतुलन के लिए क्या-क्या खाना चाहिए। सभी के शरीर की जरूरत अलग हो सकती है।

प्रतिदिन एक्सरसाइज जरूरी

अच्छी सेहत के लिए रोजाना एक्सरसाइज बहुत जरूरी है। ढलती उम्र में हार्ट रेट बढ़ाने के लिए एरोबिक एक्सरसाइज कर सकते हैं। हार्ट रेट बेहतर रहने से शरीर में ऑक्सीजन की सप्लाई अच्छी बनी रहती है। इससे सभी ऑर्गन्स की हेल्थ भी अच्छी रहती है। साइकिलिंग, डांसिंग, लॉन्ग वॉकिंग, जॉगिंग, रनिंग और स्विमिंग अच्छी एरोबिक एक्सरसाइज हैं। इस दौरान हमारे शरीर का बड़ा मसल ग्रुप एक्टिव होता है।

यह सब हार्ट हेल्थ के लिए तो अच्छा है ही, साथ ही इससे डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर को भी कंट्रोल करने में मदद मिलती है। एरोबिक एक्सरसाइज कम-से-कम सप्ताह में दो बार करनी चाहिए। इससे हड्डियों और मांसपेशियों की ताकत बरकरार रहती है। 40 से अधिक उम्र के बाद और अगर कोई मेडिकल कंडीशन है तो एक्सरसाइज शुरू करने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लें।

रेगुलर हेल्थ चेकअप है जरूरी

हार्ट डिजीज, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, किडनी डिजीज और कैंसर जैसी क्रोनिक डिजीज से बचने के लिए रेगुलर हेल्थ चेकअप जरूरी है। अगर बीमारियों का पता शुरुआती स्टेज में ही चल जाए तो इनका इलाज इतना मुश्किल नहीं होता है।

हर व्यक्ति की अलग हेल्थ कंडीशन हो सकती है। उसके हिसाब से ही उसे बॉडी चेकअप की जरूरत होती है। इस बारे में डॉक्टर से बात कर सकते हैं कि किस तरह की जांच की जरूरत है और कितने दिनों के अंतराल में जांच की आवश्यकता है।

मेंटल हेल्थ का ख्याल रखना है जरूरी

उम्र ढलने के साथ हमारा कॉग्निटिव फंक्शन भी कमजोर पड़ने लगता है। मेमोरी पॉवर वीक होने लगती है। इसके अलावा वृद्धावस्था में भावनाओं की उथल-पुथल भी बढ़ जाती है। अकेलापन महसूस होने लगता है और चिंताएं बढ़ जाती हैं। इस सबका सीधा असर हमारी मेंटल हेल्थ पर पड़ता है। एंग्जायटी और डिप्रेशन का खतरा बढ़ जाता है।

हमें ‘एज विद ग्रेस’ के कॉन्सेप्ट के साथ जिंदगी का आनंद लेना चाहिए। अपनी बकेट लिस्ट निकालें। जीवन में जो यात्राएं अधूरी रह गई हैं, उन्हें पूरा करें। घर में सभी सदस्यों के साथ दोस्ताना संबंध बनाएं। हेल्दी खाना खाएं। जीने का कोई-न-कोई मकसद बरकरार रखें।

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एशियाई वुडबॉल चैंपियनशिप 2025 इंडोनेशिया में भारत ने जीते सिल्वर और ब्रॉन्ज

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 27 अगस्त 2025 | जयपुर – जकार्ता : भारतीय एथलीटों ने इंडोनेशिया बोगोर के जेएसआई रिज़ॉर्ट में आयोजित 13वीं एशियाई कप वुडबॉल चैंपियनशिप 2025 में कांस्य पदक जीता है। उद्घाटन समारोह में भारतीय वुडबॉल टीम का नेतृत्व हाथों में तिरंगा लहराते हुए डॉ प्रेम प्रकाश मीणा ने किया जो कि दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मी बाई कॉलेज में सहायक प्रोफ़ेसर हैं। किंतु मैन स्ट्रीम मीडिया से यह ख़बर गायब है। इस चैंपियनशिप में ताइवान, चीन, ईरान, दक्षिण कोरिया, मलेशिया, हांगकांग, सिंगापुर, भारत और मेज़बान देश इंडोनेशिया सहित पूरे एशिया के सैकड़ों एथलीट भाग ले रहे हैं।

एशियाई वुडबॉल चैंपियनशिप 2025 इंडोनेशिया में भारत ने जीते सिल्वर और ब्रॉन्ज

भारतीय वुडबॉल टीम ने 7वीं AICE इंडोनेशिया वुडबॉल चैंपियनशिप 2025 में अपना शानदार खेल दिखाया है। भारतीय पुरुष टीम ने जहां इस टूर्नामेंट में कांस्य पदक जीता है तो सिंगल स्ट्रोक इवेंट में भरत कुमार ने सिल्वर मेडल जीता है।

वुडबॉल एक ऐसा खेल है जिसमें गेंद को गेट से पार कराने के लिए एक हथौड़े का इस्तेमाल किया जाता है। यह खेल घास, रेत या घर के अंदर खेला जा सकता है। यह खेल एशियाई समुद्र तट खेलों के कार्यक्रम में शामिल है और इसे 2008 में शामिल किया गया था। जल्द ही ओलंपिक गेम्स में भी हो सकता है शामिल। 

राजस्थान के भरत कुमार ने पुरुष एकल स्ट्रोक इवेंट में रजत पदक जीता

राजस्थान के भरत कुमार ने पुरुष एकल स्ट्रोक इवेंट में असाधारण कौशल और दृढ़ता दिखाते हुए रजत पदक जीता। उनके शानदार स्ट्रोक और दबाव में शांत रहने की क्षमता ने उन्हें मेडल दिलाया, जिससे वह भारत के सबसे होनहार वुडबॉल खिलाड़ियों में से एक बन गए। इसके अलावा, भारतीय पुरुष टीम ने स्ट्रोक प्रतियोगिता (टीम इवेंट) में कांस्य पदक हासिल कर शानदार सामूहिक प्रदर्शन किया। पदक विजेता टीम में शामिल थे:  
– विश्वराज परमार (गुजरात)  
– डॉ प्रेम प्रकाश मीणा (नई दिल्ली)  
– ललित डांगी (मध्य प्रदेश)  
– जयराज राठवा (गुजरात)  
– रितेश येतू गवास (गोवा)  
– सतीश चकाला (आंध्र प्रदेश)  

भारतीय वुडबॉल खिलाडियों की खूब हुई तारीफ

इंडोनेशियाई वुडबॉल एसोसिएशन (IWbA) के अध्यक्ष आंग सुनादजी ने खिलाड़ियों की उपलब्धियों की सराहना की और सुधार की गुंजाइश भी जताई। उन्होंने बुधवार, 20 अगस्त, 2025 को जकार्ता से एक आधिकारिक बयान में कहा, “मेजबान देश होने के नाते, अभी भी बहुत कुछ सुधार की आवश्यकता है। हालाँकि, ये केवल प्रारंभिक परिणाम हैं। कल, सभी टीमें अंतिम दौर में फिर से प्रतिस्पर्धा करेंगी, इसलिए सभी प्रतिभागियों के लिए अवसर खुला रहेगा।”

भारत में बढ़ रहा है वुडबॉल का क्रेज

भारतीय खिलाड़ियों ने अपनी मेहनत, समर्पण और दृढ़ संकल्प की बदौलत यह कामयाबी हासिल की है। दोहरे पदक ने न केवल भारत को गौरव दिलाया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय वुडबॉल में देश की स्थिति को और मजबूत किया है। इस चैंपियनशिप में भारत के विभिन्न हिस्सों से कुल 24 सदस्यों की टीम ने हिस्सा लिया, जो देश में वुडबॉल की बढ़ती लोकप्रियता और पहुंच को दर्शाता है।

क्या बोले भारतीय कप्तान

भारतीय टीम की अगुवाई महाराष्ट्र के एडवोकेट सुदीप मनवटकर ने किया, जिनकी प्रेरणा और मार्गदर्शन ने खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जीत पर अपनी खुशी जाहिर करते हुए सुदीप ने कहा कि यह जीत भारतीय वुडबॉल की बढ़ती ताकत और देश में इस खेल के उज्ज्वल भविष्य को दिखाती है।

टीम मैनेजर राजेंद्र पिरनकर ने भी अपने मैनेजमेंट और नेतृत्व क्षमताओं के साथ खिलाड़ियों को प्रेरित किया और मैदान के अंदर और बाहर बेहतर कोऑर्डिनेशन सुनिश्चित किया। इंडोनेशिया में यह जीत भारतीय वुडबॉल के लिए एक मील का पत्थर है, जो न केवल व्यक्तिगत प्रतिभा की ताकत बल्कि टीम वर्क की भावना को भी दर्शाती है। विदेशी धरती पर तिरंगे का ऊंचा होना पूरे देश के लिए गर्व का क्षण है।

वुडबॉल को भारत में 2002 में लाया गया था और इसे वुडबॉल एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा बढ़ावा दिया जाता है , जो एक सरकारी पंजीकृत निकाय है जो राष्ट्रीय चैंपियनशिप का आयोजन करता है और अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में टीमें भेजता है। खिलाड़ी गेंद को गेटों की एक श्रृंखला के माध्यम से मारने के लिए एक मैलेट का उपयोग करते हैं, यह खेल गोल्फ या क्रोकेट के समान है, और इसे विभिन्न सतहों पर खेला जा सकता है। भारत में वुडबॉल समुदाय बढ़ रहा है, जिसका प्रमाण एशियाई और विश्व चैंपियनशिप में भारतीय टीम की भागीदारी और नागपुर और वडोदरा जैसे शहरों में राष्ट्रीय आयोजनों का आयोजन है।

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नागपुर 22 से 26 मार्च तक सीनियर और सब-जूनियर पुरुष एवं महिला राष्ट्रीय वुडबॉल टूर्नामेंट की मेज़बानी की। भारतीय वुडबॉल कैलेंडर में एक प्रमुख आयोजन होगा। इसके अतिरिक्त, वुडबॉल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (WAI) ने इसी सत्र से राष्ट्रीय बीच वुडबॉल टूर्नामेंट शुरू करने का निर्णय लिया है।

भारत में वुडबॉल के बारे में मुख्य तथ्य:
परिचय: वुडबॉल को भारत में 2002 में पेश किया गया था।
शासी निकाय: वुडबॉल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (WbAI) इस खेल को बढ़ावा देने और विकसित करने के लिए जिम्मेदार राष्ट्रीय निकाय है, जिसके 26 संबद्ध राज्य संघ हैं।
गेमप्ले: गोल्फ की तरह, खिलाड़ी एक निर्दिष्ट कोर्स में गेट के माध्यम से गेंद को मारने के लिए मैलेट का उपयोग करते हैं। यह खेल घास, रेत या घर के अंदर खेला जा सकता है।
अंतर्राष्ट्रीय भागीदारी: भारतीय टीम ने पहली बार 2003 में किसी अंतर्राष्ट्रीय चैम्पियनशिप में भाग लिया था और उसके बाद से विभिन्न विश्व और एशियाई चैम्पियनशिप में भाग लिया है।
राष्ट्रीय कार्यक्रम: डब्ल्यूबीएआई सीनियर और सब-जूनियर राष्ट्रीय वुडबॉल चैंपियनशिप जैसे आयोजनों का आयोजन करता है, जो हाल ही में नागपुर जैसे स्थानों पर आयोजित किया गया ।
विश्वविद्यालय स्तर: यह खेल विश्वविद्यालयों में भी लोकप्रिय है, तथा पारुल विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में अखिल भारतीय अंतर-विश्वविद्यालय वुडबॉल चैम्पियनशिप जैसे आयोजन किये जाते हैं।

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जैसलमेर में मेघा गांव में जुरासिक काल के उड़ने वाले डायनासोर के जीवाश्म मिले

मूकनायक मीडिया ब्यूरो | 21 अगस्त 2025 | जयपुर – जैसलमेर : जैसलमेर में मेघा गांव के पास तालाब के किनारे जुरासिक काल के उड़ने वाले डायनासोर के जीवाश्म (फॉसिल) मिले हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अभी जो सतह के बाहर दिख रहा है, वो जुरासिक काल के डायनासोर की रीढ़ की हड्डी हो सकती है। बाकी का पार्ट जमीन में 15 से 20 फीट नीचे है।

जैसलमेर में मेघा गांव में जुरासिक काल के उड़ने वाले डायनासोर के जीवाश्म मिले

जैसलमेर के भूजल वैज्ञानिक नारायण दास इणखिया ने बताया- 2 दिन पहले 19 अगस्त को ग्रामीणों को जीवाश्म मिले तो वे चौंक गए। इसके बाद 20 अगस्त को फतेहगढ़ प्रशासन को इसकी जानकारी जैसलमेर कलेक्टर प्रताप सिंह को दी। जैसलमेर प्रशासन ने इसकी सूचना हमें दी। गुरुवार को हम फतेहगढ़ उपखंड क्षेत्र के मेघा गांव पहुंचे।

जैसलमेर के भूजल वैज्ञानिक नारायण दास इणखिया का दावा है कि

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ये जैसलमेर के इतिहास में अब तक सबसे बड़ा कंकाल मिला है। जियोलॉजिकल सर्वे के अनुसार, हजारों साल पहले जैसलमेर समुद्र का किनारा रहा था, जहां डायनासोर खाने की तलाश में आते थे। ऐसे में यहां इनके जीवाश्म मिल रहे हैं।

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अब जियोलॉजिकल सर्वे की टीम जांच करेगी। जीवाश्म कितना पुराना है? किस जानवर का है? ऐसे सवालों के जवाब तभी मिल पाएंगे। भूजल वैज्ञानिक डॉ. नारायण दास इणखिया ने जीवाश्म का निरीक्षण कर इसे जुरासिक काल का होने का अनुमान लगाया है।

पहले वो तस्वीर, जिसमें जीवाश्म दिख रहे हैं…

भूजल वैज्ञानिक डॉ. नारायण दास इणखिया ने जीवाश्म का निरीक्षण कर इसे जुरासिक काल का होने का अनुमान लगाया है।

लाखों साल पुराना कंकाल सुरक्षित

डॉ. इणखिया ने बताया- प्राथमिक जांच करने पर यह जुरासिक काल का होने का अंदाजा लगा है। यानी ये डायनासोर या उसके किसी समकक्ष जीव की हड्डियों का कंकाल हो सकता है। अगर यह किसी अन्य जानवर की हड्डियां होती तो इसे अन्य मांसाहारी जानवर खा सकते थे।

ये कंकाल सुरक्षित है तो ये जीवाश्म बनने की प्रक्रिया में है और जम गया है। ऐसे में यह हजारों साल पुराना होने का अंदाजा है। इसके संरक्षण और शोध की आवश्यकता है। प्रशासन के माध्यम से जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया को लिखा जाएगा। इसके साथ ही शोध करने वालों को भी आमंत्रित किया जाएगा ताकि वे इसकी जांच कर हकीकत बता सकें।

डॉ. इणखिया ने बताया- जीवाश्म मिलना तो आम है। इसके साथ स्केलेटन मिलने से यह माना जा रहा है कि यह लाखों-करोड़ों साल पुराने अवशेष हो सकते हैं। ये किसी उड़ने वाले डायनासोर का हो सकता है, जिसकी लम्बाई करीब 20 फीट या उससे भी ज्यादा हो।

2 साल पहले खोज चुके डायनासोर का अंडा

जैसलमेर के भूजल वैज्ञानिक नारायण दास इणखिया को 2023 में जेठवाई पहाड़ी के पास ही मॉर्निंग वॉक के दौरान एक अंडे का जीवाश्म मिला था। यह लाखों वर्ष पुराने किसी अंडे का अवशेष था। इससे पहले थईयात की पहाड़ियों में भी डायनासोर के पदचिन्हों के निशान मिले थे, जिसे बाद में कोई चुराकर ले गया।

जैसलमेर में जुरासिक काल के प्रमाण मौजूद

डॉ. इणखिया बताते हैं- जैसलमेर में इससे पहले भी थईयात के आसपास के इलाकों में डायनासोर के पंजे के निशान मिले थे। इसके साथ ही आकल गांव में भी 18 करोड़ साल पहले के पेड़ मिले हैं, जो अब पत्थर हो गए हैं। आकल गांव में ऐसे पेड़ों के जीवाश्म को लेकर ‘वुड फॉसिल पार्क’ भी बनाया गया है।

तीन जगहों को कहते हैं डायनासोर का गांव

डॉ. इणखिया बताते हैं- जैसलमेर शहर में जेठवाई की पहाड़ी, यहां से 16 किलोमीटर दूर थईयात और लाठी को ‘डायनासोर का गांव’ कहा जाता है। इसकी वजह है कि इन जगहों पर ही डायनासोर होने के प्रमाण मिलते हैं। जेठवाई पहाड़ी पर पहले माइनिंग होती थी। लोग घर बनाने के लिए यहां से पत्थर लेकर जाते थे।

ऐसे ही थईयात और लाठी गांव में सेंड स्टोन के माइनिंग एरिया में डायनासोर के जीवाश्म मिलते हैं। तीनों गांवों में ही माइनिंग से काफी सारे अवशेष तो नष्ट हो गए थे। जब यहां डायनासोर के जीवाश्म मिलने लगे तो सरकार ने माइनिंग का काम रुकवा दिया। अब तीनों जगहों को संरक्षित कर दिया गया है।

मेघा गांव के पास प्राचीन जीवाश्म और कंकाल का ढांचा मिला है। कुछ ऐसे पत्थर हैं, जो जीवाश्म बन चुके हैं।

मेघा गांव के पास प्राचीन जीवाश्म और कंकाल का ढांचा मिला है। कुछ ऐसे पत्थर हैं, जो जीवाश्म बन चुके हैं।

जैसलमेर में थे डायनासोर ऐसे पता चला

डॉ. इणखिया बताते हैं- जुरासिक प्रणाली पर 9वीं इंटरनेशनल कांग्रेस आयोजित होने के बाद जयपुर के वैज्ञानिक धीरेंद्र कुमार पांडे और विदेशी वैज्ञानिकों की टीम वर्ष 2014 में जैसलमेर घूमने आई थी। तब टीम ने वुड फॉसिल पार्क विजिट किया और जुरासिक युग के फॉसिल (जीवाश्म) देखे।

इस दौरान टीम को जैसलमेर शहर से 16 किलोमीटर दूरी पर जैसलमेर-जोधपुर हाईवे के पास थईयात गांव के पास मिट्टी हटाने पर डायनासोर के पैरों के निशान मिले थे। तब स्टडी से अनुमान लगाया गया कि यह थेरोपोड डायनासोर के थे।

पैरों के निशान बलुआ पत्थर पर मिट्टी हटाने के बाद ऊपरी सतह पर मिले थे। इसी गांव में बाद में टेरोसॉरस रेप्टाइल डायनासोर की हड्डियां भी मिली थीं। भूजल वैज्ञानिक डॉ. नारायण दास इणखिया का मानना है कि ये जीवाश्म व कंकाल डायनासोर या उसके किसी समकक्ष जीव के हो सकते हैं।

भूजल वैज्ञानिक डॉ. नारायण दास इणखिया का मानना है कि ये जीवाश्म व कंकाल डायनासोर या उसके किसी समकक्ष जीव के हो सकते हैं।

डायनासोर खाना ढूंढने आते थे

डॉ. नारायण दास इणखिया ने बताया- जैसलमेर में डायनासोर खाने की तलाश में आते थे। आज से करीब 25 करोड़ साल पहले जैसलमेर से गुजरात के कच्छ तक बसा रेगिस्तान जुरासिक युग में टेथिस सागर हुआ करता था। यह वो समय था जब अमेरिका, अफ्रीका और इंडिया सभी देश एक ही महाद्वीप में थे। तब जैसलमेर से लगे टेथिस सागर में व्हेल और शार्क की ऐसी दुर्लभ प्रजातियां थीं, जो आज विलुप्त हो गई हैं।

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